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…और बिक गए बच्‍चों के सारे दीए, दिवाली हो गई हैप्‍पी

…और बिक गए बच्‍चों के सारे दीए, दिवाली हो गई हैप्‍पी

…और बिक गए बच्‍चों के सारे दीए, दिवाली हो गई हैप्‍पी

बेहद मासूम। सुबह से बैठे हैं। उम्मीद है दीए बिकेंगे। जिन बच्चों को त्योहार पर उछल कूद करनी चाहिए वो बाज़ार में बैठे हैं। मजबूरी है, गरीबी की। बेबसी की। चार पैसे आ जाएं तो खुश हो जाएं, मगर बच्चों की लाचारी देखिए दीए नहीं बिक रहे। लोग बाज़ार आ रहे हैं तो लाइट खरीद रहे हैं। झालर खरीद रहे हैं। महंगे आइटम खरीद रहे हैं। अगर कोई दीया खरीद भी रहा तो बच्चों से नहीं, बड़े दुकानदारों से।

बच्चे बेबसी से लोगों को आते और जाते देख रहे हैं…। सोच रहा हूं जब ये बच्चे अपने माता-पिता के साथ खरीदारी करने आए बच्चों को देख रहे होंगे, तो इन मासूमों के दिल की कैफियत क्या होगी? क्या दिल में हलचल होगी…?

जहां ये बच्चे बैठे हैं वो जगह है यूपी का ज़िला अमरोहा, गांव सैद नगली। ये मेरा अपना गांव है, जहां मैं पला बढ़ा हूं। दिवाली का बाज़ार सजा है। तभी पुलिस का एक दस्ता बाज़ार का मुआयना करने पहुंचता है। चश्मदीद का कहना है कि दस्ते में सैद नगली थाना के थानाध्यक्ष नीरज कुमार थे। दुकानदारों को दुकानें लाइन में लगाने का निर्देश दे रहे थे, उनकी नजर इन दो बच्चों पर गई। जो ज़मीन पर बैठे कस्टमर का इंतज़ार कर रहे हैं। चश्मदीद का कहना है कि मुझे लगा अब इन बच्चों को यहां से हटा दिया जाएगा। बेचारों के दीए बिके नहीं और अब हटा भी दिए जाएंगे। रास्ते में जो बैठे हैं…।

थानाध्यक्ष बच्चों के पास पहुंचे। उनका नाम पूछा। पिता के बारे में पूछा। बच्चों ने बेहद मासूमियत से कहा, ‘हम दीए बेच रहे हैं। मगर कोई नहीं खरीद रहा। जब बिक जाएंगे तो हट जाएंगे। अंकल बहुत देर से बैठे हैं, मगर बिक नहीं रहे। हम गरीब हैं। दिवाली कैसे मनाएंगे?”

चश्मदीद का कहना है बच्चों की उस वक़्त जो हालत थी बयां करने के लिए लफ़्ज़ नहीं हैं। मासूम हैं, उन्हें बस चंद पैसों की चाह थी, ताकि शाम को दिवाली मना सकें। नीरज कुमार ने बच्चों से कहा, दीए कितने के हैं, मुझे खरीदने हैं…। थानाध्यक्ष ने दीए खरीदे। इसके बाद पुलिस वाले भी दीए खरीदने लगे। इतना ही नहीं, फिर थाना अध्यक्ष बच्चों की साइड में खड़े हो गए। बाज़ार आने वाले लोगों से दीए खरीदने की अपील करने लगे। बच्चों के दीए और पुरवे कुछ ही देर में सारे बिक गए। जैसे जैसे दीए बिकते जा रहे थे। बच्चों की खुशी का ठिकाना नहीं था।

जब सब सामान बिक गया तो थाना अध्यक्ष और पुलिस वालों ने बच्चों को दिवाली का तोहफा करके कुछ और पैसे दिए। पुलिस वालों की एक छोटी सी कोशिश से बच्चों की दिवाली हैप्पी हो गई। घर जाकर कितने खुश होंगे वो बच्चे। आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते।

मुझे लगता है, बच्‍चों को भीख देने से बेहतर है कि अगर वो कुछ बेच रहे हैं तो खरीद लिया जाए, ताकि वो भिखारी न बन जाएं। या किसी अपराध की तरफ रुख ना कर बैठें। उनमें इस तरह मेहनत करके कमाने का जज़्बा पैदा हो सकेगा। गरीबी ख़तम करने में सरकारें तो नाकाम हो रही हैं। मगर हमारी और तुम्हारी इस तरह की एक छोटी कोशिश किसी की परेशानी को हल कर सकती है।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

लेखक

मोहम्‍मद असगरमोहम्‍मद असगर

मोहम्‍मद असगर

बीबीसी लाईव

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