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‘घोटाले और भ्रष्टाचार से डूबा कोल सेक्टर’

‘घोटाले और भ्रष्टाचार से डूबा कोल सेक्टर’

‘घोटाले और भ्रष्टाचार से डूबा कोल सेक्टर’

रिपोर्ट-अब्दुल सलाम क़ादरी-

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उदारीकरण की नीति के बाद लाइसेंस राज की जगह आवंटन राज ने ले ली और यहीं से लूट की शुरुआत हुई…
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सवाल यह है कि और कितना स्पेक्ट्रम या फिर कितनी लोहे की खदानें? या फिर कितने पोर्ट्स और एयरपोर्ट्स? या फिर किसी अरबपति की लालसा कहां जाकर खत्म होगी? 1886 में लियो टॉल्सटॉय की लिखी गई एक कहानी ‘हाऊ मच लैंड डज अ मैन नीड’ में एक गरीब रूसी किसान पाहोम अपनी पत्नी की बेइज्जती का बदला लेने के लिए जमीन जुटाने की कसम खाता है।

पाहोम कड़ी मेहनत और बचत के दम पर अपने इस सपने को पूरा करने में सफल होता है और वह बड़ा जमींदार बन जाता है। लेकिन, इस दौरान उसके अंदर लालच की भावना घर कर जाती है। जब पाहोम के सामने यह प्रस्ताव रखा जाता है कि वह सुबह से शाम के बीच तक जितनी जमीन अपने पैरों से नाप सकेगा, वह उसकी हो जाएगी तो वह इसके लिए तैयार हो जाता है। शाम होते होते वह पूरी तरह से थक जाता है और आखिरकार वहीं आ खड़ा होता है, जहां से उसने सुबह में चलना शुरू किया था। जब उसका नौकर जमीन की नाप लेता है पता चलता है कि पाहोम महज 6 फुट जमीन पर ही अपना दावा सुनिश्चित कर पाया था। इतनी जमीन पाहोम को दफनाने के लिए काफी थी।

21वीं सदी के भारत के बारे में जब लिखा जाएगा तो उसमें लालच के पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकेगा। सरकार की योजनाओं और नीतियों से जिन लोगों को जबरदस्त फायदा हुआ है, उनके लिए इसका अंत कुछ अलग तरह से हो सकता है।

1990 के शुरुआती दशक में एक सीनियर अधिकारी ने मुझे बताया था कि उदारीकरण के पहले दशक में बिजनस में सेल्फ मेड शख्सियतों की सफलता की कहानी वाकई में सच्ची थी। हालांकि 2000 तक स्थिति पूरी तरह से बदल गई। यह वह दौर था, जब बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की शुरुआत होने लगी थी और इसमें बड़े पैमाने पर जमीन, पूंजी और संसाधनों की जरूरत थी और इसके आवंटन में सरकार को अपने विवेक का इस्तेमाल करने की पूरी आजादी थी। लाइसेंस राज की जगह आवंटन राज ने ले ली और यहीं से लूट की शुरुआत हुई।

25 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने अपने जजमेंट में 1993-2010 के बीच आवंटित सभी कोल ब्लॉक्स को अवैध करार दिया। कोर्ट ने कहा कि आवंटन के दौरान किसी किस्म की पारदर्शिता को फॉलो नहीं किया गया और दिशा-निर्देशों को ताक पर रखते हुए कोल ब्लॉक्स आवंटित किए गए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आवंटन के दौरान किसी निष्पक्ष प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और इसमें सरकार का रुख बेहद औपचारिक रहा। कोर्ट ने कहा, ‘किसी पारदर्शी और स्पष्ट प्रक्रिया के बगैर राष्ट्रीय संपदा को अनुचित तरीके से डिस्ट्रीब्यूट किया गया।’ जिन लोगों को कैप्टिव ब्लॉक दिए गए उन्होंने जानबूझकर इसे डिवेलप नहीं किया। कुल आवंटित ब्लॉकों में से सिर्फ छठे हिस्से से ही उत्पादन हो रहा है।

इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2012-13 में जहां 56.76 करोड़ टन कोयले का उत्पादन हुआ वहीं 2013-14 में 57.1 करोड़ टन कोयले का उत्पादन हुआ। इस दौरान जहां प्रॉडक्शन में गिरावट आई वहीं कोयले के इंपोर्ट में इजाफा हुआ। 2012-13 के 14.5 करोड़ टन के मुकाबले 2013-14 में 17.1 करोड़ टन कोयला इंपोर्ट किया गया। जबकि भारत में दुनिया का सबसे बड़ा कोयले का भंडार है लेकिन भ्रष्टाचार, सरकार की सांठ-गांठ और उदासीनता की वजह से कुल 301 अरब टन के रिजर्व के दसवें हिस्से को ही माइनिंग के लिए आवंटित किया गया। मैंने 2014 के खबर 30 दिन-नेसनल न्यूज़ मैगज़ीन के जुलाई के कॉलम में लिखा भी था कि कोयले की आपूर्ति में आई गिरावट की वजह से बिजली उत्पादन पर बुरा असर पड़ा है।

क्रमशः जारी अगले अंक में-

अब्दुल सलाम क़ादरी

बीबीसी लाइव-एडिटर

खबर 30 दिन-एडिटर इन चीफ

बीबीसी लाईव

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