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रूस के साथ दो लाख करोड़ के लड़ाकू विमान समझौते से अलग होगा भारत, ये है वजह

रूस के साथ दो लाख करोड़ के लड़ाकू विमान समझौते से अलग होगा भारत, ये है वजह

रूस के साथ दो लाख करोड़ के लड़ाकू विमान समझौते से अलग होगा भारत, ये है वजह

Mon Jul 09 06:56:38 IST 2018

बीबीसी लाइव ब्यूरो दिल्ली—
नई दिल्ली, प्रेट्र। रूस के साथ मिलकर दो लाख करोड़ रुपये (30 अरब डॉलर) की लागत से पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान विकसित करने की परियोजना से भारत ने बाहर निकलने की इच्छा व्यक्त की है। भारत ने रूस को इससे अवगत भी करा दिया है। इसकी वजह परियोजना की अत्यधिक लागत को बताया गया है।

आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि दोनों देशों के बीच इस बेहद महत्वाकांक्षी परियोजना पर बातचीत अभी खत्म नहीं हुई है। इसका कारण यह है कि लागत को उचित तरीके से साझा करने का कोई फॉर्मूला निकलने की स्थिति में भारत लड़ाकू विमान के सहविकास पर फिर से विचार करने को तैयार है।

मालूम हो कि सैन्य संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के मकसद से भारत और रूस के बीच 2007 में लड़ाकू विमानों को संयुक्त रूप से तैयार करने का अंतर-सरकारी करार हुआ था। लेकिन लागत साझा करने, इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक और तैयार किए जाने वाले विमानों की संख्या के मसले पर गंभीर मतभेदों के कारण पिछले 11 साल से यह परियोजना अटकी हुई है। परियोजना पर बातचीत में शामिल एक शीर्ष अधिकारी ने बताया, ‘हमने परियोजना की लागत समेत तमाम मसलों पर अपनी राय रख दी है। लेकिन रूसी पक्ष की ओर से अब तक कोई प्रतिबद्धता व्यक्त नहीं की गई है।’

बता दें कि भारत ने लड़ाकू विमान के प्रारंभिक डिजायन के लिए दिसंबर, 2010 में 29.5 करोड़ डॉलर देने पर सहमति व्यक्त की थी। बाद में दोनों पक्षों ने अंतिम डिजाइन और पहले चरण में विमान के उत्पादन के लिए छह-छह अरब डॉलर का योगदान देने पर सहमति जताई, लेकिन इस पर कोई अंतिम समझौता नहीं हो सका।

कहां फंसा है पेंच

भारत चाहता है कि विमान में इस्तेमाल होने वाली तकनीक पर दोनों देशों का समान अधिकार हो, लेकिन रूस विमान में इस्तेमाल की जाने वाली सभी अहम तकनीकों को भारत के साथ साझा करने के लिए तैयार नहीं है। वार्ता के दौरान भारत ने जोर देकर कहा कि उसे सभी जरूरी कोड और अहम तकनीक उपलब्ध कराई जानी चाहिए ताकि वह अपनी जरूरतों के हिसाब से विमान को अपग्रेड कर सके। फरवरी, 2016 में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर की सहमति से परियोजना पर वार्ता फिर शुरू हुई थी। दोनों देश गतिरोध वाले मसलों का समाधान निकालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन भारत परियोजना की बेहद ऊंची लागत की वजह से इसके फलदायी होने के प्रति आशान्वित नहीं है।

एचएएल कर रही पैरवी, वायुसेना की रुचि नहीं

दिलचस्प बात यह है कि सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) इस परियोजना की जोरदार पैरवी कर रही है। उसका मानना है कि इस परियोजना के जरिये भारत को अपने एरोस्पेस सेक्टर को बढ़ावा देने का सुनहरा मौका मिलेगा क्योंकि किसी अन्य देश ने भारत को आज तक ऐसी अहम तकनीक का प्रस्ताव नहीं दिया है। वहीं, दूसरी ओर ऊंची लागत की वजह से भारतीय वायुसेना ने इस परियोजना में दिलचस्पी नहीं दिखाई है।

बीबीसी लाईव

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